दानसरा मुक्तिधाम की दुर्दशा: ज़िंदा को सुविधा नहीं, अब मृतकों को भी नहीं मिल रहा सम्मान

सारंगढ़
कहते हैं इंसान को जीते जी सुकून न मिले तो कम से कम मौत के बाद तो शांति मिल ही जाती है, लेकिन ग्राम पंचायत दानसरा का मुक्तिधाम इस कहावत को भी झूठा साबित कर रहा है। यहां हालात ऐसे हैं कि मरने वाले को भी चैन से विदा होना नसीब नहीं हो पा रहा।
मुक्तिधाम की हालत देखकर लगता है मानो यह श्मशान घाट नहीं, बल्कि कोई परित्यक्त खंडहर हो। दीवारें टूटी, छत जर्जर, जमीन उबड़-खाबड़ और चारों ओर अव्यवस्था का साम्राज्य। ऐसा प्रतीत होता है कि विकास की गाड़ी गांव तक पहुंचते-पहुंचते थक कर बैठ गई और मुक्तिधाम तक आना ही भूल गई।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां बाउंड्रीवाल तक नहीं है। यानी अंतिम संस्कार के दौरान शोक संतप्त परिजनों के साथ-साथ आवारा मवेशी भी ‘शामिल’ हो जाते हैं। कई बार तो ऐसा दृश्य बन जाता है मानो कोई सार्वजनिक मैदान हो, न कि किसी की अंतिम यात्रा का स्थान। ग्रामीण तंज कसते हुए कहते हैं — “यहां इंसान से ज्यादा जानवरों को आजादी मिली है।”
बरसात में कीचड़, गर्मी में धूल और हर मौसम में बदहाली — यही है दानसरा मुक्तिधाम की पहचान। मूलभूत सुविधाएं तो दूर, बैठने तक की व्यवस्था नहीं। शोक में डूबे परिजन भी व्यवस्था की लापरवाही पर आंसू बहाने को मजबूर हो जाते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार पंचायत और प्रशासन को शिकायत की गई, लेकिन शायद फाइलें भी इस मुक्तिधाम की तरह जर्जर हो चुकी हैं, तभी कोई सुनवाई नहीं हो रही। ऐसा लगता है जैसे जिम्मेदारों ने भी सोच लिया हो कि “जो यहां आता है, वह शिकायत करने वापस तो आएगा नहीं।”
अब ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि कम से कम मृतकों की गरिमा का ख्याल रखते हुए मुक्तिधाम का तत्काल जीर्णोद्धार कराया जाए, बाउंड्रीवाल बनाई जाए और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। ताकि अंतिम यात्रा कम से कम सम्मानजनक तो हो सके।
क्योंकि सच्चाई यही है — जब श्मशान भी बदहाल हो जाए, तो विकास के दावों की चिता अपने आप जल उठती है।


